बदरीनाथ: बदरीनाथ धाम में हालिया सांस्कृतिक कार्यक्रम को लेकर शुरू हुआ विवाद अब मंदिर में शंख न बजाने की परंपरा तक पहुंच गया है। इस मुद्दे पर अलग-अलग धार्मिक और ऐतिहासिक तर्क सामने आने के बाद बहस तेज हो गई है।
बदरीनाथ धाम में आयोजित देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल में संगीत कार्यक्रम को लेकर पहले से ही चर्चाएं चल रही हैं। इसी बीच बदरीनाथ में शंख बजाने की परंपरा को लेकर भी अलग-अलग मत सामने आए हैं।
बदरीनाथ धाम के पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल के अनुसार, बदरीनाथ में भगवान विष्णु के साक्षात विराजमान होने की मान्यता है। ऐसे में भगवान के आवाहन के लिए शंखनाद की आवश्यकता नहीं मानी जाती।
उन्होंने बदरीनाथ क्षेत्र से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं का उल्लेख करते हुए बताया कि शंख वादन न करने की परंपरा के पीछे धार्मिक और पौराणिक प्रसंग भी बताए जाते हैं। तुलसी की तपस्या और शंखचूड़ से जुड़े प्रसंग को भी इस परंपरा से जोड़ा जाता है।
बदरीनाथ में शंख न बजाने की परंपरा का अर्थ यह नहीं है कि पूजा-पद्धति में शंख का इस्तेमाल नहीं होता। भगवान बदरीविशाल की नित्य पूजा, अभिषेक और महाभिषेक में शंख का प्रयोग किया जाता है। भोग को पवित्र करने के लिए भी शंख का उपयोग किया जाता है।
यानी यहां शंख का धार्मिक उपयोग होता है, लेकिन शंख फूंकने की परंपरा अलग मानी जाती है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार बदरीनाथ यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर शंख ध्वनि की परंपरा रही है। ज्योतिर्मठ के नृसिंह मंदिर, पांडुकेश्वर और अन्य स्थानों से यात्रा शुरू होने के अवसर पर शंख बजाया जाता है। हनुमान चट्टी तक भी शंख ध्वनि की परंपरा बताई जाती है।
इसके बाद बदरीनाथ धाम क्षेत्र में शंखनाद नहीं किया जाता।
शंख न बजाने की परंपरा को लेकर एक अन्य तर्क हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों से जुड़ा है। कुछ लोगों के अनुसार, पहले बदरीनाथ और आसपास के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में हिमस्खलन का खतरा अधिक रहता था। ऐसे में शंख की तेज ध्वनि से होने वाले कंपन को लेकर भी आशंका जताई जाती थी।
हालांकि इस विषय पर धार्मिक मान्यताओं और प्राकृतिक कारणों को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आती रही हैं।
बदरीनाथ में हाल में हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम को लेकर धार्मिक संगठनों और राजनीतिक नेताओं की अलग-अलग प्रतिक्रियाओं के बाद शंख वादन की परंपरा भी चर्चा के केंद्र में आ गई है। अब बहस केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है, बल्कि बदरीनाथ धाम की पारंपरिक पूजा-पद्धति और धार्मिक मर्यादाओं को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
बदरीनाथ से जुड़ी सदियों पुरानी परंपराओं के अलग-अलग धार्मिक, पौराणिक और स्थानीय संदर्भों को देखते हुए इस विषय पर विभिन्न मत सामने आना जारी है।
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