Breaking News
news-details
बुद्धिजीवी की कलम से
तेरी कलम मेरी कलम

लोककलाओं में झलका उत्तराखंड का जीवन, नृत्य मंचन और शिल्प में दिखी है भव्यता

उत्तराखंड की कला में नृत्यों के विभिन्न स्वरूप हैं। उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रो के अनुरूप यहां नृत्यों का संयोजन भी हुआ है। नृत्य की जो छटा आपको रंवाईं जोनसार में दिखेगी उससे अलग मुनस्यारी पर। पर हर कला निखरी हुई अपनी पारपंरिक परिधान और आभूषणों के साथ। अपनी लय में। वेदना और प्रेम के प्रतीक झुमैलो नृत्य है। फ्यूंली के फूलों को चुनती हुई युवतियां जब चैत में घरों के द्वारों पर फूल डालती हैं उसके बांसती गीत हैं। यहां चौफला नृत्यों का भी सौंदर्य है। कुमाऊं क्षेत्र में खरीफ के समय का हुडकि बोल गीत नृत्य प्रधान हैं। विवाहित युवतियों के जरिए मायके आकर आंगन में किया गया थडिया जौनसारी जनजातियों का रमतुला वाद्य लेकर किया जाने वाला हारुल और तलवार ढाल लेकर किया जाने वाला  युद्ध कला का सरौं और छोलियां यहां के युद्ध कौशल की छवियों को नृत्यों में  प्रस्तुत करते हैं। सलूड डुंगरा, रमाण नृत्य कला को अंतराष्ट्रीय स्तर पर विश्व सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सम्मान मिला है। यहां नृत्य की विविधता उच्च स्वरूप और कला बोध का स्पर्श पाकर ही विख्यात नृत्यकार उदय शंकरजी ने अल्मोडा में नृत्य अकादमी की स्थापना की थी। उत्तराखंड अपने नृत्यों पर झूम उठता है। यहा तक कि उत्तराखंड आंदोलन के प्रहरी इंद्रमणि बडोनी चौंफला केदार नृत्यगीत के विशेषज्ञ माने गए। यहां उत्तराखंड में विभिन्न क्षेत्रों के चर्चित लोग लोक कलाओं से भी गहरे जुडे रहे हैं।  उत्तराखंड के पारंपरिक लोकनृत्यों को प्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना अनु सिंह कार्की फ्यूजन के साथ प्रस्तुत कर रही हैं।, वही आज के दौर में उत्तराखंड के लोकगीतों पर इशान डोभाल,  राजेश, पंडित सारस्वत,  अमित सागर लोकसंगीतमें फ्यूजन की बयार ला रहे हैं। पुराने लोकगीतों को नए साजो के साथ प्रस्तुति को नए समय में पसंद भी किया जा रहा है। यह बदले हुए वक्त की अनुगूज भी है। उत्तराखंड  में लोकवाद्य अपनी मधुर गूंज के साथ हैं। असम में अगर डमरू है जो उत्तराखंड में हुडका प्रतीक वाद्य है। तांबे और साल की लकडी का बना ढोल दमाऊ के साधक तो अब दुनिया भर है। बांसुरी जैसे अलगोजा, रणसिंघा डोर थाली जैसे कई वाद्य यहां बजाए जाते हैं। स्काटलैंड से आया बैगपाइपर यहां मशकबीन हो गया। उत्सव पर्व विवाह आदि के समय यह अपनी सुमधुर लहरी छेडता है। उत्तराखंड की पहाडियों में बासुरी का अपना महत्व हमेशा रहा।  बांसुरी कहे या मुरली न जाने कितने गीत बने हैं। यहा मुरली आनंद की अपेक्षा करण पक्ष को ज्यादा उभारती है। पहाडों में ऊंचे ऊचे स्थानों में तो बासुरी बजती ही रही लोक कलाकारों के लिए भी यह प्रमुख साज रहा। यहां के जीवन में घुले मिले है ढोल दमऊ मशकबीन और बांसुरी। पुराने समय में कला के प्रति कितना अनुराग रहा कि ढोल के लिए उपयुक्त विजयसार की लकडी का भी उपयोग किया। जबकि विजयसार का हिमालयी क्षेत्र कावृक्ष नहीं है। ढोल सागर अपना आप में रहस्य की तरह है। उत्तम दास इसके बडे जानकार थे।  सोहन दास वाद्य निपुण और प्रीतम  भर्तवाण इसे दुनिया के समक्ष ले गए हैं। केशव अनुरागी ने जिस ढोलसागर पुस्तक को लिखा है उसमें ढोल सागर की विस्तृत सुंदर वर्णन मिलता है।  चंद्र सिंह राही , ब्रह्मानंद और मोहन लाल बाबुलकर ने इस विधा का प्रचार प्रचार किया।  तरह हुडका के लिए कच्ची लकडी का इस्तेमाल किया गया। यह हमारी परंपरा और संस्कृति का द्योतक है।  ढोल में नोबत ब्रह्ममहूर्त में जगाती है। मंदिरों में नोबत बजाने वाले लोक कलाकार रहे हैं। जिन्होंने मंदिरों को स्वर आभा से गुंजायमान करके रखा।

 

नाट्य कला  रंगमंच में उत्तराखंड की अपनी पुरानी परंपरा रही है। यहां सदियों से नाटक खेल गए ,रामी बोराणी  माधो सिंह भंडारी जैसे  ऐतिहासिक चरित्रों को लेकर तो सृजन हुआ है पांडव लीला, शकुतला दुष्यंत भकत प्रल्हाद नाटको के विषय बने। बाद में समसामयिक विषयों पर खाडू लापता, रामी बोराणी , माधो भंडारी,, जैसे नाटक खेले गए।  यहां की दारमा घाटी रंग संस्कृति के लिए जानी जाती है। पिछली दो सदियों से रंगकर्म मंचन यहां बहुत पनपा। वाचस्पती थपलियाल, गोविंद बल्लभ पंत, राजेंद्र धस्माना  डा डी आर पुरोहित  राकेश भट्ट जैसे संस्कृतकर्मियों ने इस विधा को समृद्ध किया। थियेटर के अऩुरूप पहाडों में रामलीला बहुत लोकप्रिय रही है। यहां की रामलीला रागरागनियों, चौपाई, बहरे तबील विहाग के गायन में दिखती है। यहां रामलीला मेंबोली संवाद में अवधी प्रभाव है। कहीं कहीं पहाडी लोकभाषा में भी रामलीला खेली गई है। अल्मोडा पौडी श्रीनगर रामनगर रामलीला का स्तर सराहनीय रहा है।  गांव में खेतों और खुले प्रांगण में किए जाए वाले चक्रव्यूह और कमल व्यूह जैसे मंचन प्राचीन थाती की तरह है जिसे डा डी आर पुरोहित  राकेश भट् जैसे रंगकर्मी अथक साधना से फिर सामने लाए हैं। इस प्राचीन कला को नए स्वरूप और आधुनिक तकनीक के साथ संवारा गया है। इसी श्रंखला में मुखौटा नृत्य को भी शामिल कर सकते हैं। केदार घाटी में तो कई घंटो तक गाए जाने वाले पंडवार्तवार्ता का संकलन मिलता है। 

उत्तराखंड की चित्रकला में गढवाली शैली का प्रभाव रहा है। गढवाल के शाह नरेंशों के सरंक्षण में यहा चित्र कला क उन्नत रूप मिला। मोला राम तोमर गढवाली शैली  के प्रमुख चित्रकार हुए हैं। बैरिस्टर मुकुंदीलाल बेरिस्टर उनके चित्रों को सबसे पहले दुनिया के सामने लाए। उनकी चित्रकला में पहाडों का जीवन, दर्शन, अनुभूति प्रकृति की सुंदरता, गाथाएं यहां के चित्रों में निरूपित हुई। जहां एक तरफ मोला राम तोमर के चित्रों में मयूर प्रिया, ऋतु वर्णन, जैसे चित्र पहाडों की कला की विरासत है वही स्वामी राम की पेंटिग्स भी सराही गई है। पहाडी घसियारी, पहाडी लोकनृत्यों विषय बनाकर  प्रख्यात चित्रकार रणवीर सिंह  बिष्ट  चित्र अपना महत्व रखते हैं। इसी तरह भैरव दत्त जोशी  बी मोहन नेगी ने भी पहाड के सरोकारो को ध्यान में रखकर चित्र बनाए हैं।  उत्तराखंड में लोक भाषा में फिल्म निर्माण का काम हुआ लेकिन बहुत देर से। अस्सी के दशक में पारेश्वर गौड़ ने पहली फिल्म जग्वाल बनाकर इसका शुभारभ किया। जबकि मेघा आ कुमाऊनी फिल्म बनकर सामने आई। घरजवैं , तेरा सौं  ल्या ठुंगार और गोपी भिन्ना जैसी फिल्म बनकर आई हैं। इन फिल्मो के आरंभ से अब तक के वर्षों में पहाडी परिवेश और समसामयिक विषयों को ही लिया गया।

 यहां मूर्ति शिल्प एक सुंदर कला के रूप में सामने आया है। कत्यूर वंश और  उससे पहले भी पहाडों  में मूर्ति कला उत्कृष्ट रूप में थी। अगर मंदिरों को देखें तो नौंवी सदी का कटारमल्ल सूर्य मंदिर और आठवीं सदी के जागेश्वर के मंदिर अपनी कला शिल्प के लिए अऩूठे हैं । राज्य में मूर्ति कला की जो समृद्ध परंपरा है उसमें खुदाई से मिली मूर्तियां उत्तर और दक्षिण भारत का साम्य रखती हैं। उत्तराखंड में शक्ति और सभी देवों की मूर्तियां मिलती हैं। लाखामंडल में शिव की संहारक की मूर्तियां आभास कराती हैं  कि  इस क्षेत्र में मूर्ति शिल्प कितना उन्नत था।  लाखामडल में ही गणेश की मूर्ति 12 शताब्दी की मानी गई है। उत्तराखंड के मंदिरों में खासकर  दक्षिण भारतीय शैली का प्रभाव दिखता है। अवतार सिंह की शिल्प भी अनूठा है। उनकी उकेरी कृतियां मन को मोहती है। यशोधर मठपाल ने बहुत परिश्रम से मूर्ति शिल्प और काष्ठ शिल्प की प्रतिकृतियों को लेकर एक संग्रहालय का रूप भी दिया हुआ है। यहां अवलोकन करने पर उत्तराखंड की प्राचीन कला का अवलोकन किया जा सकता है। लोक कला यहां पारंपरिक परिधान में भी झलकी आभूषणों में भी। यहां की प्रकृति जलवायु और परिवेश के मुताबिक आंगडी घाघरा, मिराज. गुलबद, बास्कट  टोपी पिछौड महज परिधान नहीं , उनकी प्रकृति कला का भी स्वरूप है। इसी तरह टिहरी दुनिया में अपने आकर्षण स्वरूप, सज्जा बनावट और बारिक काम के लिए जानी गई। सलाण क्षेत्र की नथ भी सुंदर सजीली है। मुर्खुली,बुलांक नथुली,  हंसुला, चरे, झंवर, धगुला की सुंदर बनावट यहां की कला के स्वरूप है। कुशल हाथों और सदियों से चली आ रही परंपरा के प्रतीक है। आज भी लोक मंगल लोक पर्व त्यौहारों में इन्हे बहुत लगाव से पहना जाता है। न जाने कितने गीत इन आभूषणों से श्रंगार की कल्पना पर रचे गए हैं।  खुटी का झंवर बजी मेरा हिवांला। घुर घुर उजैलो ह्वेगो, ( पांव में पहने झंवर बजते सुनाई दे रहे हैं धीरे धीरे उजाला हो रहा है।) सात भयो की ब्वे, सात धगुली  समलौण्या रैगेन सात झगूली, सात बुआरियों की गडेली नथूली ब्वे, जाज मा जाण की ना । विश्व युद्ध में जाते एक पहाडी युवा की भावनाओं पर रचा यह गीत उसे अपने घर परिवार के पूरे परिवेश की याद दिला रहा है। )   सोना की जंजीर सुआ सोना की जंजीर तेरी मेरी भैंट हली देवी का मंदिर , स्वर्ग तारा। जुन्यैली रात कौ सुणौलो तेरी मेरी बात।  ऐसा ही एक प्रेम सौंदर्य का गीत है। काष्ठ शिल्प में चमोली अल्मोडा पिथोरागढ के रिंगाल और  कई इलाकों में लकडी की पाली ठेकी अपनी सुंदर सज्जा के साथ लोगों के हाथ पहुंचती रहीं। उत्तराखंड की कला यहां   जौनसार नैनबाग रंवाई मुन्सयारी के घर आंगन तिवारी और खिडकियों की सज्जा पर भी झलकती है। महसूस होता है कि काष्ठ पर यह काम कितनी सुंदरता से हुआ होगा । रंवाई जौनसार के इन घरों में प्राचीन शिल्प को निहारे या अल्मोडा के नैना देवी मंदिर की सज्जा को देखें  उत्तराखड की लोककला का वैभव नजर आता है। तांबे लोहे पर भी बहुत सुंदर काम  होता आता है। तांबे पर अल्मोडा चमोली के बने पुराने बर्तन, लोहाघाट में लोहे का काम यहां के प्राचीन शिल्प का द्योतक है। आज भी गेडू कढाई बंठी जैसे बडे पुराने गावों के शादी  उत्सव पर्व के समय नजर आते हैं। कांसे तांबे के गिलास थालियां नक्काशी के साथ दिख जाती हैं। धारचूला और पिथौरागढ की कालीन अपने टिकाऊपन और सुंदरता के लिए जानी गई।

त्यौहार,  मेले, जात्राएं  इस हिमालयी क्षेत्र की संस्कृति में पूरी तरह रचे बसे हैं। अऩेकों मेलो  त्यौहार पर्व अपनी अपनी शैलियों परंपरा और स्वरूप में मनते आए हैं। इनको केवल धार्मिक क्रियाकलाप न मानते हुए लोकजीवन के पक्ष से गहरे जोडा गया है। इसके तत्व में आनंद भी है और जीवन का व्यवहार भी। मेले जिन्हें कौथिक माना गया उसके विस्तार में केवल किसी देव की पूजा भर  का आयोजन नहीं बल्कि वह जीवन की गतिविधियों को संचालित करने का माध्यम और प्रेरक भी बना।  उत्तराखंड में मेलों का ऐतिहासिक महत्व है। और उत्तराखंड का जो परिवेश था उसमें ऐसे मेलों का महत्व स्वभाविक था। कहीं न कहीं मेलों व्यवसायिक गतिविधि भी संचालित होती थी। यही लोक सांस्कृतिक चेतना भी जगती थी यहीं आनंद भी तलाशा जाता था। पर पवित्रता का भाव बना हे इसलिए मेलों का मुख्य आधार कहीं न कहीं किसी देव या प्रकृति ऋतु आदि से जोडा गया। उत्तरकाशी का मेला, बागेश्वर कामेला जौलजीवी का मेला  बिसू मेला गोचर मेला , नुणाई मेला तमाम ऐसे आयोजन है। इनमें हमारी संस्कृति का स्वरूप झलक आता है। बरसो बरस से ये परंपराए चली आ रही है। यहां तो शरीर को चुभने वाली कंडाली घास पर भी बारह वर्ष के बाद एक मेला लगताहै। यह माना जाता है कि कंडाली कई रूपों में औषधी भी है साथ ही पशुंओ के लिए गर्म चारा भी। उत्तराखंड में चमोली के कांसुआ गांव से होमकुंड तक 280 किमी की नंदा राजजात यात्रा यहां के लोक जीवन और मान्यताओं में  सांस्कृतिक स्वरूप के जिस ताने बाने के साथ सजती है वह केवल उत्तराखंड नहीं पूरी मानवीय जाति के लिए दर्शनीय है। कैलाश मानसरोवर यात्रा,  पंवाली कांठा कदार यात्रा  सहस्त्र ताल महाश्रताल के अलावा छोटी बडी कई यात्राओं में केवल दूरी भर नहीं नापी जाती। बल्कि इस अनुष्ठान में संस्कृति सभ्यता और परिवेश के कई स्वरूप साथ साथ होते हैं। उत्तराखंड ऐसे ही लोकजीवन लोक सभ्यता और लोक कला को लेकर अपनी पहचान बनाए हुए हैं। 

ये भी पढें-http://http://lekhanadda.com/682/uttarakhand_culture_lok_kala   लोककलाओं  में  झलका उत्तराखंड  का जीवन

             http://lekhanadda.com/716/uttarakhand_beautiful_tradition_folk_litrature_and_folk_singing   उत्तराखंड- लोक साहित्य और लोक गायन की रही है सुंदर परंपरा

0 Comments

Leave Comments